सारण : कॉटन का कुर्ता और इटैलियन जूते ! बाढ़ में क्यों नहीं दिखते 'साहब' ? 3 लाख की आबादी पानी में...

किसी नेता को अगर अपनी अज्ञानता का अहंकार हो, तो दिल को यह सोचकर तसल्ली मिल जाती है कि जब शिक्षा ही इनके चौखट तक नहीं पहुँच पाई, तो बेचारी आमजन की समस्या क्या ख़ाक पहुँच पाएगी। लेकिन जब ज्ञान अर्जित करने के बाद भी अहंकार की चादर तान ली जाए, तो फिर समझ आता है कि गलती रहनुमा की नहीं, बल्कि उस भोली जनता की ही है जिसने चमकते चेहरे पर आँख मूँदकर वोट कर दिया।
अर्थशास्त्र (Economics) में स्नातक करने के बाद भी रहनुमा अगर यह न समझ पाएँ कि किसी ग़रीब परिवार का आशियाना बाढ़ में ध्वस्त होने के बाद उसकी जेब और पेट पर क्या बीतती है, तो फिर उस डिग्री को दीवार पर टांगने का क्या औचित्य ? सबसे 'रमणीक' बात तो यह है कि हमारे रहनुमा ने अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर (MA) भी कर रखा है। फिर भी सारण और छपरा की आर्थिक और सामाजिक तबाही जस की तस है।

वैसे, यह क्षेत्र का परम सौभाग्य रहा होगा कि रहनुमा के पास क़ानून (LLB) की भी डिग्री है। यानी संविधान, अधिकार और जन-कल्याण की धाराएँ तो उन्हें ज़बानी याद होंगी। इतना ही नहीं, पायलट की ट्रेनिंग लेकर आसमान में कई कमर्शियल विमान उड़ा चुके रहनुमा की उपलब्धियाँ गिनने बैठें तो शायद हमारी ही सांस फूल जाए। लेकिन ताज्जुब की बात यह है कि इतने सक्षम, सर्वगुण संपन्न और 'ज्ञान के पुरोधा' रहनुमा को आख़िर किस बात का गुरूर है ? अपने क्षेत्र की जनता को उफनती नदियों के रहमों-कदम पर छोड़कर साहब किस 'अन्य ग्रह' पर जीवन व्यतीत कर रहे हैं, यह सवाल अब अलौकिक और रहस्यमयी हो चुका है।
पायलट साहब के दिलो-दिमाग की नसों में जनता की कराह सुनकर मदद की बयार कब दौड़ेगी, यह शोध का विषय है। ऐसा भी नहीं है कि रहनुमा काम नहीं करते, वे काम करते हैं, उन्होंने किया भी है, और आगे भी करते रहेंगे। कम से कम अपने मीडिया सेल के प्रेस-रिलीज़ में तो ज़रूर करेंगे। लेकिन जब बढ़ते-बढ़ते दर्द ही दवा बन जाए, उसके बाद मरहम लगाने का कोई औचित्य नहीं रह जाता।

वर्तमान स्थिति यह है कि सारण में बाढ़ की तबाही से 100 करोड़ रुपये से अधिक के नुकसान का अनुमान है। 33 पंचायतों के 170 गाँव जलमग्न हैं। 3.32 लाख से अधिक आबादी पर बाढ़ की सीधी मार पड़ी है। आपदा प्रबंधन विभाग के आँकड़ों के अनुसार लगभग 75,286 परिवार इस तबाही की चपेट में हैं और अब तक 43,400 लोगों को जैसे-तैसे सुरक्षित स्थानों पर निष्क्रमित किया गया है। लेकिन अफ़सोस, ये आँकड़े शायद रहनुमा के PA (निजी सहायक) ने अब तक साहब की चमचमाती डायरी में नोट करके उन्हें दिखाए ही नहीं हैं!
राहत सामग्री पहुँचाने के लिए बेचारी एयरफ़ोर्स को अपने हेलिकॉप्टर उतारने पड़ रहे हैं। कई इलाके ऐसे हैं जहाँ पानी का प्रवाह इतना तेज है कि राहत पहुँचना नामुमकिन हो रहा है। ऐसे में इलाके की बेबस जनता उन प्रशासनिक अधिकारियों का धन्यवाद कर रही है जो कम से कम घुटने भर पानी में खड़े होकर मदद को आगे आ रहे हैं। क्योंकि साहब तो अंत में कैमरे के सामने प्रकट होकर यही चमकीला बयान देंगे, "हमने प्रशासन को हर संभव मदद और मुस्तैदी के निर्देश दे दिए थे"।
जिस रहनुमा की झोली में इस क्षेत्र के 4 लाख 71 हजार 752 लोगों ने अपने भविष्य का वोट डाला था, वे अपनी ही 3 लाख 32 हजार की बेघर आबादी का हाल तक पूछने नहीं आए। अखबारों की रिपोर्ट बताती है कि सितम्बर की शुरुआत में साहब का एक 'शाही प्रतिनिधिमंडल' पीड़ितों से मिला था, नाव पर बैठकर समस्याओं की फोटो भी खिंचवाई थी। लेकिन 'असली साहब' गायब हैं। शायद बाढ़ के इस गंदे और मटमैले मौसम में साहब गाँव आ ही नहीं सकते, आखिर कॉटन का कड़क कुर्ता-पायजामा ख़राब हो जाएगा, और इटैलियन चमड़े के जूते पानी में भीग गए तो विमान के कॉकपिट में ब्रेक कैसे लगेगा ?

इलाके के किसान अपनी लहलहाती फसलों को डूबते देख रहे हैं, मवेशियों के लिए चारे का नामोनिशान नहीं है, और छपरा की सड़कों पर जलजमाव ऐसा है मानो पूरा शहर ही किसी अप्रत्यक्ष नौकायन प्रतियोगिता का हिस्सा बन गया हो। स्मार्ट सिटी और हाई-टेक विकास का दावा करने वाले रहनुमा के पास शायद इस जल-प्रलय को देखने का 'एयर-ट्रैफिक क्लीयरेंस' ही नहीं मिल पा रहा है।
अंत में बस इतना ही कहा जा सकता है कि सारण की जनता को अब यह समझ आ जाना चाहिए कि जब प्रतिनिधि आसमान का पायलट हो, तो ज़मीन पर जलभराव की चिंता करना उसकी 'प्रोफ़ाइल' में नहीं आता। डिग्रियों का अंबार और उड़ानों का अनुभव भले ही पासपोर्ट के पन्नों को भारी कर दे, लेकिन अगर वह संकट के समय ज़मीन पर उतरकर किसी ग़रीब के आँसू न पोंछ सके, तो वह ज्ञान सिर्फ़ राजनीतिक अलमारी में रखी एक सजावटी वस्तु है। जनता पानी में तैर रही है, और रहनुमा शायद किसी दूसरे अक्षांश पर बैठकर यह हिसाब लगा रहे हैं कि अगली बार जब वे उतरेंगे, तो कैमरे का एंगल कैसा होना चाहिए। जनता को भी अब अपनी समझ का 'इंजन री-स्टार्ट' कर लेना चाहिए, क्योंकि जो रहनुमा लहरों के बीच अपनों को छोड़ दे, वह पायलट चाहे कितना भी कुशल क्यों न हो, किश्ती पार नहीं लगा सकता।