जब अपनों के मोह में टूटा योद्धा का साहस: अर्जुन का संताप और श्री कृष्ण का अमर उपदेश

महाभारत का वह पल, जब मोह में पड़कर अर्जुन ने शस्त्र उठाने से मना कर दिया, क्या एक योद्धा अपनों पर वार कर सकता है? यही सवाल अर्जुन को परेशान कर रहा था। रानी साह की लिखी इस सुंदर कविता में बताया गया है कि कैसे अर्जुन हार मानकर बैठ गए थे और कृष्ण ने उन्हें धर्म के लिए लड़ने की हिम्मत दी।
अर्जुन हैं, असमंजस में तात!
मैं न अस्त्र उठाऊंगा
हताश होकर गिरा है,
योद्धा रण में मैं कैसे टिक पाऊंगा
प्रतिद्वंद्वी हैं रिश्ते मेरे
मैं रिश्तों की बलि न चढ़ाऊंगा
गुरु वध पाप है, गुरु वध कलंक न, मैं कमाऊंगा
जाने दो जो जाएगा सर्वस्व
मैं न अब हक का हाथ बढ़ाऊंगा
धरा के किसी कोने में,
पांडव कुटी बनाऊंगा
मैं जीता तो भी हारा, मैं हारा तो भी हारा,
भ्राता संग हस्तिनापुर ही छोड़ जाऊंगा
अर्जुन हैं असमंजस में, तात!
मैं न अस्त्र उठाऊंगा
हताश होकर गिरा है योद्धा
रण में मैं कैसे टिक पाऊंगा
कृष्ण ने तब मौन तोड़ा
हे पार्थ! तुम क्यों मार्ग से भटकते हो
विपक्षी बनकर खड़े हो जाए रण में
उसे तुम अपना क्यों कहते हो
निःसंकोच उतरो रण में
यह युगों-युगों का युद्ध होगा
एक पग भूमि के लिए,
भाई-भाई के विरुद्ध होगा
यह संताप छोड़ो पार्थ
धर्मराज का धर्म युद्ध होगा
वीरों के तरकश से, तीरों की वर्षा होगी
मिटेगा उससे अहंकार और घमंड का नाश होगा
अधर्म से लड़ने वाले विद्वानों का भी संहार होगा
~ रानी साह