प्रेम की पीड़ा और अटूट विश्वास, 'आँगन की तुलसी, तू मेरा जहान पिया...'

rachnakosh.in · 6 November 2025 · 2 मिनट

प्रेम की पीड़ा और अटूट विश्वास, 'आँगन की तुलसी, तू मेरा जहान पिया...'

"मैं तेरे आँगन की तुलसी, तू मेरा जहान पिया": समर्पण और विरह की एक अनूठी काव्य गाथा सच्चा प्रेम केवल पाने का नाम नहीं, बल्कि खुद को मिटा देने का नाम है। यह कविता मीरा जैसी भक्ति और निस्वार्थ प्रेम को दर्शाती है, जहाँ एक प्रेमिका अपने प्रिय में ही कान्हा, शिव और राम को देखती है। विरह की तड़प और 'प्रेम के पिंजरे से आज़ादी' जैसे गहरे भावों से सजी रानी साह की लिखी यह रचना सीधे दिल को छू लेती है।


तुझको ही तो सब कुछ माना, 

सर्वस्व तुझी पर वारी पिया 

तू कान्हा, तू शिवा, 

तू ही तो मेरा श्री राम पिया


प्रेम की पीड़ा प्रेम ही जाने,

प्रेम में खुद को हारी पिया, 

नयन निहारत, देखत रहिहूँ, 

कबहुँ से आ जाओ पिया। 

हाय ! विरह ये बिछड़न की, 

लेकर चली जाए न मेरी जान पिया।


तू मेरा जो हो जाए, हर दर 

पे करूँ पुकार पिया, मैं तेरे 

आँगन की तुलसी, तू मेरा जहान पिया


मन की अभिलाषा में, 

बहते अश्रु की भाषा में, दिल की

हसरतें कह जाऊं पिया। प्रेम में कोई 

नहीं बंधन, प्रेम पिंजरे से तोहे आज़ाद किया।


तू मेरा जो प्रेम पंछी होवे, 

पिंजरे में एक दिन लौट आना पिया

ना चाहूँ तुझसे हीरे-मोती, 

ना फूलों पे पाँव पिया


मोह पे चढ़ियो प्रीत रंग तोरे, 

अपने रंग में हमें रंग जाओ पिया 

संग-संग तेरे, हर पग पे चल पाऊँ, 

दे देना तनिक प्रेम की छाँव पिया


प्रेम की पीड़ा प्रेम ही जाने, 

प्रेम में खुद को हारी पिया, 

मैं तेरी हो जाऊँ, हर दर पे करूँ फ़रियाद पिया

मैं तेरे आँगन की तुलसी, 

तू मेरा जहान पिया, हाय! विरह ये 

बिछड़न की, लेकर चली जाए न मेरी जान पिया


~ रानी साह