Nitish Kumar 'मुख्यमंत्री जीवन बीमा' की पॉलिसी अब अपने आखिरी दौर में

मानव जीवन के विकास की हर कहानी का आदि-अंत जंगल, पहाड़ और नदी से जुड़ा है। बिहार की राजनीति में यह किस्सा थोड़ा अलग है। यहाँ हर कहानी का आदि-अंत कुर्सी से जुड़ा है। कुर्सी पर बैठने वाले बहुत आए, लेकिन नीतीश जैसा कोई दूसरा नहीं, बिहार की राजनीति के सबसे बड़े 'धुरंधर'। नीतीश ने कुर्सी इसलिए छोड़ी ताकि फिर से कुर्सी पर बैठ सकें। खैर, कुर्सी पर बैठने का सिलसिला तो राज्यसभा तक जारी रहेगा, लेकिन नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री बने रहने की 'जीवन बीमा' पॉलिसी कुछ ही दिनों में खत्म हो जाएगी।
"वो आए, गए और फिर वापस लौट आए,
इस्तीफे के खेल में उन्होंने नए रिकॉर्ड बनाए..."

"जाना हिन्दी की सबसे खौफनाक क्रिया है, जब मैं कहता हूँ कि वह जा रहा है, तो मेरा मतलब यह नहीं होता कि वह जा रहा है, मेरा मतलब यह होता है कि वह मुझसे दूर जा रहा है और धीरे-धीरे एक बिन्दु में बदलता जा रहा है - केदारनाथ सिंह"। नीतीश कुमार ने इसे बदलकर रख दिया, उनके लिए 'जाना' केवल इसलिए होता है ताकि वे 'दोबारा वापस' आ सकें। अब वह बिहार से दूर जा रहे हैं। सिर्फ शरीर दूर जा रहा है या मन से भी वह बिहार से दूर हो रहे हैं ? यह सवाल इसलिए भी, क्योंकि उन्होंने विधान परिषद की सदस्यता से इस्तीफा दिया है, न कि बिहार के मुख्यमंत्री पद से। इस प्रकरण के बाद बिहार और बिहारी के लिए राजनीति की वर्तमान तस्वीर एक त्रासदी को उजागर करती दिख रही है। बिहार 'ठिठका' हुआ है। नया मुख्यमंत्री कौन होगा ? जनता और तंत्र इसी यथास्थिति के जटिल जाल में फँसे हुए हैं। बिहार के लिए यह विडंबना ही है कि गरीबी और पिछड़ेपन पर मरहम लगाने की जगह रहनुमाओं में कुर्सी पाने और खोने का दर्द ज्यादा दिखता है।
कुर्सी की होड़ में बि'हार' कई बार 'हार' का मुख देख चुका है। कभी गरीबी में हार, कभी कुपोषण से हार, तो कभी विकास की हार। नीति आयोग द्वारा जारी बहुआयामी गरीबी सूचकांक (2021) में बिहार को देश का सबसे गरीब राज्य बताया गया। रिपोर्ट के अनुसार, बिहार की 51.91 प्रतिशत जनसंख्या गरीब है। बिहार की 51.88 प्रतिशत जनसंख्या (देश में सर्वाधिक) कुपोषण की शिकार है। हालांकि, सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग बिहार द्वारा 2023 में जारी आंकड़ों की मानें तो कुछ सुधार जरूर हुआ है। विभाग ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा कि नीति आयोग के प्रतिवेदन के अनुसार बिहार ने गरीबी दर में 18.13% की रिकॉर्ड कमी दर्ज की है, जो देश के अन्य राज्यों की तुलना में सर्वाधिक है। बिहार कमजोर है या इसे कमजोर बनाया गया ? या गरीब है इसलिए कमजोर है ? शायद वह बँट गया है इसलिए कमजोर है या कमजोर था इसलिए बँट गया ?

नीतीश ने बिहार में क्या नया किया ? क्या नीतीश के दिल्ली जाने से बिहार बेजुबान हो जाएगा ? कुछ देर के लिए इतिहास की तरफ चलते हैं। चारा घोटाला, अलकतरा घोटाला, वर्दी घोटाला, शिक्षा घोटाला, दवा घोटाला और वन घोटाला जैसे कीर्तिमान अपने मस्तिष्क पर लिए घूम रहे बिहार को नीतीश के रूप में 'यात्राओं' का कवच - कुंडल मिला। न्याय यात्रा (12 जुलाई 2005), विकास यात्रा (09 जनवरी 2009), धन्यवाद यात्रा (17 जून 2009), प्रवास यात्रा (25 दिसंबर 2009), विश्वास यात्रा (28 अप्रैल 2010), सेवा यात्रा (09 नवंबर 2011), अधिकार यात्रा (19 सितंबर 2012), संकल्प यात्रा (05 मार्च 2014), संपर्क यात्रा (13 नवंबर 2014), समाज सुधार यात्रा (24 दिसंबर 2021), समाधान यात्रा (4 जनवरी 2023), और अंत में प्रगति यात्रा व समृद्धि यात्रा। इन यात्राओं के मंथन से निकला 'अमृत' और 'विष' कहां बँटा ? यह आकलन का विषय है। कुल मिलाकर 114 साल की उम्र वाला बिहार आज भी दो अतिवादों का शिकार है, एक सिरे पर निंदा तो दूसरे पर प्रशंसा।
नीतीश ने बिहार की निंदा और प्रशंसा दोनों को बड़े सलीके से संभाला। जब वे सत्ता में आए, तब 'बिहारी' शब्द एक गाली या उपहास के समान था। बाहर के राज्यों में बिहारियों को तिरस्कार की दृष्टि से देखा जाता था। उनके लिए सबसे बड़ी 'निंदा' बिहार की खराब कानून-व्यवस्था और 'जंगलराज' की छवि थी। उन्होंने इस निंदा को व्यक्तिगत चुनौती माना और सड़कों, बिजली तथा महिला सुरक्षा पर काम कर इस 'अपमान' को 'सम्मान' में बदलने का दावा किया।

नीतीश ने अपने हिस्से की प्रशंसा को बहुत ही सधे हुए तरीके से स्वीकार किया। उन्हें दुनिया भर में तब प्रशंसा मिली जब बिहार की 'साइकिल योजना' को अफ्रीका तक में सराहा गया। वे खुद अपनी प्रशंसा करने के बजाय आंकड़ों और 'साइलेंट वोटर्स' के फीडबैक पर भरोसा करते हैं। हाल ही में अपनी 'समृद्धि यात्रा-2026' के दौरान उन्होंने बार-बार दोहराया कि बिहार अब 'भय' से मुक्त है और 'प्रेम और भाईचारे' का प्रतीक है।
नीतीश कुमार मुख्यमंत्री की कुर्सी के इतने करीब रहे कि उनके इस्तीफे के बाद 'कुर्सी' को भी अब 'अकेलापन' महसूस होगा। लोग कहते थे कि नीतीश के पास हमेशा बहुमत का गणित रहा, पर सच तो यह था कि उनके पास 'कुर्सी की केमिस्ट्री' थी। जैसा कि शुरू में जिक्र किया गया, उनके 'मुख्यमंत्री जीवन बीमा' की पॉलिसी अब अपने आखिरी दौर में है। जिस पॉलिसी का प्रीमियम नीतीश समय-समय पर 'गठबंधन' बदलकर भरते रहे, उसकी एक्सपायरी डेट आ गई। इस पॉलिसी की सबसे खास बात यह थी कि इसमें 'नॉमिनी' की जरूरत नहीं थी, बीमा कराने वाले भी वही और लाभ लेने वाले भी वही।
अंत में वापस केदारनाथ सिंह की 'जाना' क्रिया पर आते हैं। नीतीश कुमार के लिए बिहार से जाना इसलिए खौफनाक नहीं है, क्योंकि वे जानते हैं कि उन्होंने बिहार की 'निंदा' की दीवारों को ढहाकर 'प्रशंसा' की एक नई बुनियाद रखी है।
Written by : Abhinandan Dwivedi (Journalist, Former RJ)