चाँदपुर की चंदा: एक गाँव की बेबसी और बेजोड़ मोहब्बत, जहां किस्मत में सिर्फ पानी ही पानी है

rachnakosh.in · 3 January 2025 · 3 मिनट

चाँदपुर की चंदा: एक गाँव की बेबसी और बेजोड़ मोहब्बत, जहां किस्मत में सिर्फ पानी ही पानी है

नदी किनारे की जिंदगी अक्सर एक बांध के सहारे सिमट कर रह जाती है। जब बाढ़ का पानी आता है और पूरा गाँव बांध पर शरण लेता है, तब वे बेबस आँखें न सिर्फ अपने पेट की चिंता करती हैं, बल्कि अपने पशुओं के संरक्षण के लिए हर सुख का त्याग भी करती हैं। वे उस उफनते पानी में अपना बचपन, अपनी जवानी और अपना बुढ़ापा - सब कुछ छोड़ आते हैं। अतुल कुमार राय का उपन्यास 'चाँदपुर की चंदा' इन्हीं मानवीय संवेदनाओं और विमर्शों को समेटे हुए है।



यह उपन्यास सिर्फ चाँदपुर की भौगोलिक समस्याओं को ही उजागर नहीं करता, बल्कि उत्सवधर्मी भारतीय गाँवों की उन बुनियादी चुनौतियों को भी दृढ़ता से सामने रखता है - जैसे बाढ़ से जूझता गाँव, स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव और शिक्षा व्यवस्था में पैठी 'नकल' की जड़ें। साथ ही, यह 21वीं सदी में दहेज की आग में जलती हुई बेटियों की विवशता को भी दर्शाता है।


"चाँदपुर! सरयू किनारे बसा बलिया जिले का आखिरी गाँव! कहते हैं चाँद पर पानी है कि नहीं, यह तो शोध का विषय है, लेकिन चाँदपुर की किस्मत में पानी ही पानी है। चाँदपुर पानी में चलता है, पानी में जीता है और पानी में ही टूटता भी है।"


इस उपन्यास ने समाज के हर पहलू को गहराई से छुआ है - चाहे वह फोटो खिंचवाने में व्यस्त प्रशासन हो, अवसरवादी राजनीति हो या चरमराती ग्रामीण अर्थव्यवस्था। वहीं 'झांझा बाबा' जैसे चरित्र समाज के उस मानवीय पक्ष को उजागर करते हैं जो आज भी हमारा मार्गदर्शन कर रहा है। गाँव के विकास की हकीकत पर लेखक का यह कटाक्ष बेहद तीखा है:


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"हाँ, गाँव के उत्तर में एक निर्माणाधीन अस्पताल भी है, जो लगभग दो साल से बीमार पड़ा है। उसकी दीवारों का कुल जमा इतना ही उपयोग है कि उन पर गाँव की महिलाओं द्वारा आसानी से गोबर पाथा जा सकता है।"


यह कहानी सरयू किनारे बसे गाँव चाँदपुर के 'उत्तर टोला' और 'पश्चिम टोला' के दो प्रेमियों - पिंकी और मंटू की है। इनकी बेजोड़ प्रेम कहानी आपको जहाँ एक ओर हँसते-हँसते लोटपोट कर देगी, वहीं दूसरी ओर आपकी आँखों को भिगोने पर मजबूर भी कर देगी। मंटू का यह संवाद प्रेम की वास्तविक गहराई को दर्शाता है:



"मोहब्बत यूपी बोर्ड का एग्जाम नहीं है कि हम-तुम नकल मारकर पास हो जाएँगे। मोहब्बत वह दीर्घ-उत्तरीय प्रश्न है, जिसका जवाब न विद्या की गाइड में मिल सकता है, न काका की गाइड में। अब तो हम सोच लिए हैं कि इस एग्जाम में फेल ही होना है। दीपक-आरती बस फिल्म में ही मिलते हैं, असल जिंदगी में नहीं !"


लेखक ने ग्रामीण जीवनचर्या और स्त्री विमर्श को बहुत सूक्ष्मता से उकेरा है। पिंकी के चरित्र के माध्यम से हमें उस कड़वे सच का पता चलता है जहाँ समाज स्त्री को मात्र एक वस्तु समझता है। उसकी योग्यता, उसकी अभिलाषाओं और कुछ कर गुजरने के जज्बे को यह पितृसत्तात्मक समाज अक्सर दबा देता है। यदि कोई स्त्री अपनी पहचान बनाना चाहती है, तो उसके चरित्र पर कीचड़ उछालने में यह समाज देर नहीं करता।


एक पाठक के रूप में हम पढ़ते-पढ़ते खुद उस चाँदपुर गाँव का हिस्सा बन जाते हैं। कई दिनों तक हम पिंकी और मंटू के साथ गलियों में घूमते महसूस होते हैं। 'चाँदपुर की चंदा' एक ऐसा उपन्यास है जिससे आप जितनी आसानी से जुड़ेंगे, इसके प्रभाव से बाहर निकल पाना उतना ही कठिन होगा।

पुस्तक समीक्षा - अनीश कुमार 'देव'