पूजा से आगे, क्या मिले अधिकार ? महिला सशक्तिकरण और सामाजिक बदलाव पर नित्या पाठक से विशेष संवाद

वृंदावन की गलियों में लौटते होली के रंगों से लेकर देश के विभिन्न हिस्सों में महिलाओं के स्वावलंबन की नई इबारत तक सुलभ इंटरनेशनल की यात्रा केवल समाजसेवा की कथा नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा, संवेदना और सामाजिक बदलाव का एक सतत प्रयास है। यह उस सोच की कहानी है, जो किसी बेसहारा मां के चेहरे पर मुस्कान लौटाने को सेवा की सार्थकता मानती है और किसी वंचित महिला के हाथ में हुनर देकर उसे अपने भविष्य का निर्माता बनाने का स्वप्न देखती है।
डॉ. बिंदेश्वर पाठक की विरासत से प्रेरित सुलभ इंटरनेशनल ने स्वच्छता, सामाजिक पुनर्वास और मानवीय गरिमा के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई है। संस्था के सामाजिक सरोकारों का एक महत्वपूर्ण पक्ष उन विधवा एवं बेसहारा माताओं के जीवन में अपनत्व और उत्सव के रंग भरना भी है, जिन्हें सामाजिक रूढ़ियों और पारिवारिक परिस्थितियों के कारण अक्सर अकेलेपन का सामना करना पड़ता है।

नवरात्रि के पावन अवसर पर, जब देशभर में नारी-शक्ति की आराधना की जाती है, तब यह विचार और भी प्रासंगिक हो उठता है कि देवी के रूप में पूजी जाने वाली स्त्री को वास्तविक जीवन में कितना सम्मान और स्वतंत्रता प्राप्त है। इसी सवाल से शुरू होती है हमारी बातचीत नित्या पाठक, कार्यकारी संयोजक, सुलभ इंटरनेशनल के साथ। rachnakosh.in के इस विशेष संवाद में उन्होंने संस्था की सेवा-यात्रा, महिलाओं के सामने मौजूद सामाजिक चुनौतियों, कौशल विकास, डिजिटल साक्षरता और विकसित भारत के स्वप्न में महिलाओं की भूमिका पर विस्तार से अपने विचार साझा किए।
वृंदावन की विधवा माताएं: जहां सेवा ने लौटाए जीवन में रंग
भारतीय संस्कृति में नवरात्रि नारी-शक्ति की आराधना का पर्व है। इन दिनों मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की पूजा करते हुए हम शक्ति, साहस और सृजनशीलता का आह्वान करते हैं। लेकिन इस आस्था के बीच एक सवाल हमें भीतर तक झकझोरता है। क्या हमारे समाज में हर स्त्री को वास्तव में वही सम्मान और स्वतंत्रता प्राप्त है, जिसकी हम देवी के रूप में पूजा करते हैं?
वृंदावन की गलियों में रहने वाली उन विधवा महिलाओं की परिस्थितियां इस प्रश्न को और मार्मिक बना देती हैं, जो जीवनसाथी के बिछोह के बाद अपने जीवन के उत्तरार्ध में आश्रय, सुरक्षा और अपनत्व की तलाश करती हैं। उनके लिए सबसे बड़ी आवश्यकता केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि एक ऐसा वातावरण भी है, जहां वे अपने दुखों से परे जाकर फिर से जीवन की खुशियों को महसूस कर सकें। जनगणना 2011 के अनुसार, भारत में लगभग 4.33 करोड़ विधवा महिलाएं दर्ज की गई थीं। यह ऐतिहासिक आंकड़ा विधवाओं के सामाजिक और आर्थिक संरक्षण के प्रश्न की व्यापकता को रेखांकित करता है। ऐसे में वृंदावन की माताओं के जीवन में सम्मान और उत्सव के रंग लौटाने की पहल का महत्व और बढ़ जाता है। सुलभ इंटरनेशनल की इसी पहल के बारे में बातचीत आगे बढ़ाते हुए हमने नित्या पाठक से जानना चाहा कि इस सेवा-यात्रा की शुरुआत कैसे हुई और संस्था ने इन माताओं के साथ किस तरह का संबंध विकसित किया।
नित्या पाठक ने कहा कि इस पहल की नींव वर्ष 2012 में पड़ी थी, जब माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने सुलभ इंटरनेशनल से इन माताओं की देखभाल की जिम्मेदारी उठाने का अनुरोध किया था। उनके शब्दों में, यह प्रयास केवल आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि धीरे-धीरे एक आत्मीय पारिवारिक संबंध में बदल गया। उन्होंने बताया, “तब से लेकर आज तक संस्था की ओर से इन माताओं को नियमित आर्थिक सहायता और पेंशन के रूप में राशि उपलब्ध कराई जाती रही है, ताकि उनकी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में मदद मिल सके और आर्थिक असुरक्षा का बोझ कुछ कम हो।”

नित्या पाठक के अनुसार, इन माताओं में बड़ी संख्या बंगाल से जुड़ी महिलाओं की है। इसके अतिरिक्त बिहार और बनारस की माताएं भी इस परिवार का हिस्सा हैं। संस्था की कोशिश रही है कि इन महिलाओं के साथ संबंध केवल सहायता देने और लेने तक सीमित न रहे, बल्कि उनके जीवन में अपनत्व और पारिवारिक निकटता का अनुभव भी बना रहे। इस भावनात्मक जुड़ाव को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि संस्था इन माताओं के साथ होली, दिवाली और रक्षाबंधन जैसे त्योहार मनाती है। ये अवसर उनके लिए केवल उत्सव नहीं, बल्कि उस अपनत्व का प्रतीक हैं, जिसकी कमी उन्हें अपने जीवन में अक्सर महसूस होती रही है।
डॉ. बिंदेश्वर पाठक को याद करते हुए नित्या पाठक ने बताया कि पिताजी इन माताओं के साथ होली के रंगों में सराबोर होकर त्योहार मनाते थे। उनके लिए यह व्यवहार सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ने और इन महिलाओं को बराबरी के साथ स्वीकार करने का माध्यम था। उन्होंने भावुक स्वर में कहा कि आज जब ये माताएं पूरे उत्साह से सजती-संवरती हैं और रैंप वॉक जैसी प्रस्तुतियों में भाग लेती हैं, तो उनके चेहरों पर दिखाई देने वाली चमक और आत्मविश्वास संस्था के लिए सबसे बड़ा पुरस्कार बन जाता है।
नित्या पाठक के अनुसार, इस पहल का उद्देश्य इन महिलाओं को यह विश्वास दिलाना है कि जीवनसाथी के बिछोह से जीवन की खुशियां समाप्त नहीं हो जातीं। किसी महिला का विधवा होना उसके अधिकारों, इच्छाओं और आत्मसम्मान का अंत नहीं है। वह भी रंगों से खेल सकती है, उत्सव मना सकती है और जीवन को पूरी जीवंतता के साथ जी सकती है।
नारी-शक्ति की आराधना से आगे: क्या महिलाओं को वास्तव में उनका अधिकार मिला है ?
वृंदावन की माताओं की कहानी हमें भारतीय समाज के एक गहरे विरोधाभास की ओर ले जाती है। एक ओर स्त्री को देवी, मां और त्याग की प्रतिमूर्ति के रूप में प्रतिष्ठित किया जाता है, वहीं दूसरी ओर उसके अपने निर्णयों, इच्छाओं और आर्थिक स्वतंत्रता को कई बार पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता। ऐसे में महिला सशक्तिकरण का अर्थ केवल सरकारी योजनाओं या आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं रह जाता। यह उस मानसिकता को बदलने का प्रश्न भी है, जो महिला की भूमिका और उसके सम्मान को उसकी आर्थिक निर्भरता या पारिवारिक स्थिति से जोड़कर देखती है।
इसी सामाजिक चुनौती पर नित्या पाठक से बातचीत करते हुए हमने जानना चाहा कि क्या शिक्षा और रोजगार महिलाओं को समानता दिलाने के लिए पर्याप्त हैं, या समाज की दोहरी मानसिकता आज भी उनके रास्ते में बड़ी बाधा बनी हुई है। नित्या पाठक ने बताया कि चुनौतियां आज भी मौजूद हैं। कई बार लोग यह सवाल उठाते हैं कि क्या अपनी माताओं से काम करवाना उचित है, जबकि संस्था की सोच उन्हें अपनी मां की तरह सम्मान देने की है। उन्होंने स्पष्ट किया कि अधिकांश बुजुर्ग माताओं की उम्र 60 से 70 वर्ष या उससे अधिक है, इसलिए उनकी उम्र, स्वास्थ्य और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए ही गतिविधियां निर्धारित की जाती हैं। उद्देश्य उनसे कठिन श्रम करवाना नहीं, बल्कि उनके जीवन में सम्मान, अपनत्व और खुशियां लाना है।

महिला सशक्तिकरण की व्यापक तस्वीर पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि शिक्षा और रोजगार किसी भी व्यक्ति के जीवन की रीढ़ होते हैं। जब किसी महिला के पास अपनी आय का साधन नहीं होता, तो कई बार परिवार में उसकी बात को पर्याप्त महत्व नहीं मिलता। उसकी इच्छाएं और निर्णय दूसरों पर निर्भर हो जाते हैं। नित्या पाठक ने कहा कि डिजिटल साक्षरता और विभिन्न कला-कौशल के प्रशिक्षण महिलाओं को अपनी क्षमताओं को पहचानने का अवसर देते हैं। जब कोई महिला आर्थिक रूप से सक्षम होती है, तो उसके भीतर आत्मविश्वास बढ़ता है और वह परिवार तथा समाज में अपनी भूमिका को अधिक मजबूती से प्रस्तुत कर पाती है।
हालांकि, उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि आर्थिक आत्मनिर्भरता के साथ सामाजिक सोच में बदलाव जरूरी है। किसी महिला का सम्मान केवल इसलिए नहीं होना चाहिए कि वह कमाती है, बल्कि इसलिए भी कि वह एक स्वतंत्र मनुष्य है, जिसकी अपनी भावनाएं, आकांक्षाएं और अधिकार हैं। नवरात्रि की आस्था से इस विचार को जोड़ते हुए नित्या पाठक का मानना है कि देवी की आराधना तभी सार्थक होगी, जब घरों और समाज में भी महिलाओं की गरिमा को स्वीकार किया जाएगा। उनके लिए सशक्तिकरण का वास्तविक अर्थ ऐसा वातावरण बनाना है, जहां महिला भय और भेदभाव से मुक्त होकर अपने जीवन के निर्णय स्वयं ले सके।
मैला ढोने की अमानवीय प्रथा से डिजिटल आत्मनिर्भरता तक: बदलाव की नई इबारत
किसी समाज की प्रगति केवल आर्थिक वृद्धि या आधुनिक तकनीक के विस्तार से नहीं मापी जा सकती। वास्तविक प्रगति तब दिखाई देती है, जब समाज के सबसे वंचित व्यक्ति को भी सम्मानपूर्वक जीने का अवसर मिलता है। भारत में मैला ढोने की अमानवीय प्रथा लंबे समय तक सामाजिक भेदभाव और आर्थिक विवशता का प्रतीक रही है। इस काम से जुड़ी अनेक महिलाओं को न केवल अपमानजनक परिस्थितियों में जीवन बिताना पड़ा, बल्कि सामाजिक बहिष्कार और आजीविका के सीमित विकल्पों का सामना भी करना पड़ा।
सुलभ इंटरनेशनल के पुनर्वास संबंधी विवरण में डॉ. बिंदेश्वर पाठक के नेतृत्व में दो लाख से अधिक महिलाओं को इस अमानवीय प्रथा से मुक्ति दिलाने और पुनर्वास के प्रयासों का उल्लेख मिलता है। अलवर और टोंक जैसे क्षेत्रों में शिक्षा, कौशल विकास तथा वैकल्पिक आजीविका के अवसर उपलब्ध कराने के प्रयास इसी दिशा का हिस्सा रहे हैं। इस विषय पर नित्या पाठक ने कहा कि संस्था का प्रयास हमेशा महिलाओं को उनकी पुरानी परिस्थितियों से बाहर निकालने के साथ-साथ उन्हें एक बेहतर भविष्य की ओर बढ़ने का अवसर देना रहा है।
उन्होंने बताया कि डॉ. बिंदेश्वर पाठक जी ने अलवर और टोंक में मैला ढोने की अमानवीय प्रथा से जुड़ी महिलाओं के पुनर्वास के लिए महत्वपूर्ण कार्य किया। संस्था की पहल के अंतर्गत महिलाओं को शिक्षा, सिलाई-कढ़ाई, सौंदर्य प्रशिक्षण, खाद्य प्रसंस्करण और व्यक्तित्व विकास जैसे क्षेत्रों से जोड़ा गया, ताकि वे वैकल्पिक आजीविका अपनाकर सम्मानपूर्वक जीवन जी सकें। बदलते समय में डिजिटल साक्षरता की जरूरत पर जोर देते हुए नित्या पाठक ने कहा कि आज ऐसी महिलाएं भी ई-मेल अकाउंट खोलना, डिजिटल भुगतान करना और ऑनलाइन लेन-देन जैसी प्रक्रियाएं सीख रही हैं, जो कभी अक्षर ज्ञान से भी वंचित थीं।
उनके अनुसार, जब कोई महिला पहली बार अपना डिजिटल खाता स्वयं संचालित करती है या अपने पैसों का हिसाब खुद समझने लगती है, तो उसके भीतर एक नया आत्मविश्वास पैदा होता है। तकनीक उसके लिए केवल सुविधा नहीं रह जाती, बल्कि स्वतंत्रता का माध्यम बन जाती है। बिहार की पारंपरिक कलाओं और स्थानीय संसाधनों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि पटना में मधुबनी पेंटिंग और सुजनी कला से जुड़ी महिला कलाकार अपने हुनर के माध्यम से आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं। इसी तरह मखाना उत्पादन और स्थानीय उत्पादों के प्रसंस्करण में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की भी व्यापक संभावनाएं हैं।
नित्या पाठक ने युवा विधवाओं के उत्थान को भी एक महत्वपूर्ण विषय बताया। उनके मुताबिक, युवा विधवाओं के सामने आर्थिक सुरक्षा के साथ सामाजिक पुनर्स्थापन, कौशल विकास और भविष्य को लेकर अनिश्चितता जैसी चुनौतियां होती हैं। साक्षात्कार में अक्टूबर 2025 के दौरान हजारों महिलाओं को प्रशिक्षण देने से जुड़े विशेष अभियान का भी उल्लेख हुआ। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि किसी प्रशिक्षण कार्यक्रम की सफलता केवल इस आधार पर नहीं मापी जानी चाहिए कि कितनी महिलाओं ने प्रशिक्षण प्राप्त किया। यह देखना भी जरूरी है कि कितनी महिलाएं नियमित आय अर्जित कर पा रही हैं, कितनी अपना काम शुरू कर सकी हैं और कितनों को अपने परिवार तथा समाज में पहले से अधिक सम्मान मिल रहा है।
उनके विचार में, परंपरा और आधुनिकता का मेल महिलाओं के आर्थिक विकास का प्रभावी माध्यम बन सकता है। जब किसी महिला को अपनी कला पहचानने, अपने हुनर पर गर्व करने और तकनीक को अपने विकास में इस्तेमाल करने का अवसर मिलता है, तो बदलाव की संभावनाएं और व्यापक हो जाती हैं।
जब एक महिला की कमाई बदल देती है परिवार का व्यवहार
महिला सशक्तिकरण की चर्चा में अक्सर बड़े आंकड़ों, सरकारी योजनाओं और उपलब्धियों को प्रमुखता दी जाती है। लेकिन सामाजिक परिवर्तन की सबसे सजीव तस्वीर कई बार किसी एक महिला के जीवन में आए छोटे-से बदलाव में दिखाई देती है। कल्पना कीजिए उस महिला की, जो वर्षों तक अपने ही घर में अपनी बात कहने से हिचकती रही हो। उसके पास अनुभव और समझ हो, लेकिन आर्थिक निर्भरता के कारण उसकी आवाज को पर्याप्त महत्व न दिया जाता हो। फिर एक दिन वह कोई हुनर सीखती है, अपनी कमाई शुरू करती है और परिवार के आर्थिक निर्णयों में उसकी भागीदारी बढ़ने लगती है।
इसी विषय को आगे बढ़ाते हुए हमने नित्या पाठक से जानना चाहा कि क्या कौशल प्रशिक्षण, डिजिटल साक्षरता और आजीविका से जुड़े कार्यक्रम परिवारों में महिलाओं की भूमिका के प्रति दृष्टिकोण बदलने में मदद कर रहे हैं। विशेषकर तब, जब बुजुर्ग महिलाओं को अक्सर परिवार में वह स्थान नहीं मिल पाता, जो पुरुषों को सहज रूप से प्राप्त हो जाता है। इस सवाल पर अपना अनुभव साझा करते हुए नित्या पाठक ने कहा कि महिला सशक्तिकरण का अर्थ केवल युवा महिलाओं को प्रशिक्षण देना नहीं है। उम्र के हर पड़ाव पर महिलाओं को सीखने, आगे बढ़ने और सम्मान के साथ जीने का अवसर मिलना चाहिए।

उन्होंने बताया कि विभिन्न प्रशिक्षण केंद्रों में महिलाएं और बुजुर्ग माताएं भी अपनी रुचि के अनुसार गतिविधियों में भाग लेती हैं। चाहे किचन गार्डनिंग हो, सौंदर्य प्रशिक्षण हो या डिजिटल साक्षरता। इनका उद्देश्य महिलाओं को सक्रिय, आत्मविश्वासी और आत्मनिर्भर बनाना है। महाराष्ट्र में प्रशिक्षण कार्यक्रम से जुड़ी एक महिला का अनुभव साझा करते हुए नित्या पाठक ने बताया कि पहले उस महिला को परिवार में अपनी बात रखने तक का पर्याप्त अवसर नहीं मिलता था। लेकिन जब वह संस्था से जुड़ी, उसने हुनर सीखा और अपनी आय अर्जित करने लगी, तो परिवार में उसके प्रति व्यवहार बदलने लगा। उनके अनुसार, बाद में उसके पति ने उसके नाम पर जमीन का एक टुकड़ा भी किया।
इस अनुभव को महत्वपूर्ण बताते हुए नित्या पाठक ने कहा कि आर्थिक स्वतंत्रता किसी व्यक्ति के आत्मविश्वास को मजबूत कर सकती है। जब महिला परिवार के विकास में आर्थिक योगदान देती है, तो उसके विचारों और निर्णयों को भी अधिक महत्व मिलने लगता है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि महिला के सम्मान को केवल उसकी कमाई से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। यदि वह किसी कारणवश आय अर्जित नहीं कर सकती, तब भी उसे बराबर सम्मान और अधिकार मिलना चाहिए। आर्थिक स्वावलंबन सामाजिक बदलाव का एक महत्वपूर्ण माध्यम है, लेकिन समानता की नींव मानवीय गरिमा और परस्पर सम्मान में ही होती है।
विरासत से भविष्य तक: स्वच्छ, समर्थ और विकसित भारत का संकल्प
किसी सामाजिक संस्था की यात्रा केवल उसके वर्तमान कार्यों से नहीं पहचानी जाती। उसकी दिशा इस बात से भी तय होती है कि वह अपने अनुभवों और मूल्यों को आने वाली पीढ़ियों तक किस रूप में पहुंचाती है। डॉ. बिंदेश्वर पाठक जी ने स्वच्छता, सामाजिक समानता और मानवीय गरिमा को जोड़कर जिस कार्य-दृष्टि को विकसित किया, उसने सुलभ इंटरनेशनल को व्यापक सामाजिक पहचान दिलाई। उनकी विरासत का महत्वपूर्ण पक्ष यह था कि सामाजिक समस्याओं का समाधान केवल सहानुभूति से नहीं, बल्कि व्यावहारिक विकल्पों, शिक्षा और आजीविका के अवसरों से भी तलाशा जाना चाहिए।
आज भारत वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने की आकांक्षा के साथ आगे बढ़ रहा है। इस यात्रा में महिलाओं की भागीदारी को केंद्रीय स्थान देना आवश्यक है। स्वच्छता, शिक्षा, तकनीकी दक्षता, आर्थिक आत्मनिर्भरता और सामाजिक सम्मान, ये सभी एक-दूसरे से जुड़े हुए आयाम हैं। इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में बातचीत को आगे बढ़ाते हुए हमने नित्या पाठक से पूछा कि डॉ. बिंदेश्वर पाठक जी की विरासत और परिवार से मिले संस्कारों को आगे बढ़ाते हुए वह विकसित भारत की कल्पना में महिलाओं की भूमिका को किस रूप में देखती हैं और भविष्य के लिए उनकी व्यक्तिगत प्राथमिकताएं क्या हैं।

नित्या पाठक ने कहा कि बचपन से ही उनका झुकाव स्वच्छता, सेवा और मानवीय पीड़ा को कम करने की दिशा में रहा है। परिवार से मिले संस्कारों तथा आदरणीय ससुर जी और पतिदेव, कुमार दिलीप जी, के सहयोग ने इस विचार को और मजबूत किया कि समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति की सेवा करना जीवन का महत्वपूर्ण दायित्व है। डॉ. बिंदेश्वर पाठक जी के कार्यों को याद करते हुए उन्होंने कहा कि उनसे यह सीख मिली कि किसी व्यक्ति की परिस्थितियां चाहे जैसी हों, उसकी गरिमा से समझौता नहीं किया जा सकता। समाजसेवा का वास्तविक अर्थ तभी पूरा होता है, जब प्रयास किसी के जीवन में ठोस बदलाव ला सकें।
भविष्य की अपनी कल्पना साझा करते हुए नित्या पाठक ने कहा कि वह एक ऐसे भारत का सपना देखती हैं, जहां स्वच्छता केवल सरकारी अभियान न हो, बल्कि नागरिक जीवन का स्वाभाविक हिस्सा बने। जहां महिलाओं को शिक्षा और रोजगार के अवसर मिलें, बुजुर्ग माताएं अकेलेपन और उपेक्षा के बजाय सम्मान तथा अपनत्व के साथ जीवन बिता सकें और विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे।
भविष्य में किसी बड़े दायित्व या संवैधानिक पद की संभावना के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि इस विषय में अभी निश्चित रूप से कुछ कहना उचित नहीं होगा। ये आने वाला वक्त ही बताएगा. उन्होंने कहा की मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण अपने संकल्प के प्रति ईमानदार रहना और महिलाओं तथा माताओं के उत्थान के लिए निरंतर काम करते रहना है। उनके विचार में वर्ष 2047 का विकसित भारत तभी पूर्ण होगा, जब विकास के साथ संवेदना, समृद्धि के साथ समानता और आधुनिकता के साथ मानवीय मूल्य भी आगे बढ़ेंगे।
नित्या पाठक के साथ 'रचनाकोश' मंडली से अभिनंदन द्विवेदी की बातचीत...